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Shakambhari
शाकम्भरी देवी इतिहास - Shakambhari Devi History

शाकम्भरी माता का इतिहास

सहारनपुर में पतितपावनी गंगा और यमुना के मध्य पावन भूमि में स्थित शाकम्भरी माता का विशाल मंदिर एक प्रसिद्ध शक्तिपीठ है।

माता के दर्शन से सभी यात्रियों को आध्यात्मिक शान्ति और आशीर्वाद मिलता है। यह यात्रा सात भागों में विस्तृत कथा के माध्यम से प्रस्तुत की गई है।

शाकम्भरी देवी
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जय माता शाकम्भरी

उत्तर प्रदेश के पश्चिमी द्वार जिला सहारनपुर में पतितपावनी गंगा और यमुना के मध्य पावन भूभाग में सहारनपुर नगर से 26 मील उत्तर में रम्यशिवालिक के आंचल में प्रसिद्ध शक्तिपीठ विश्वेश्वरी माँ शाकम्भरी का विशाल मंदिर स्थित है। सारे देश से यात्री इस स्नेहमयी माँ का दर्शन करने आते रहते हैं और माँ के दर्शन कर यात्री ऐसा अनुभव करता है मानो उसे माँ ने अपनी ममतामयी गोद में बैठाकर उससे प्यार किया है, अभय कर दिया है और उसकी पीठ को अपने वरदायी हाथों से छुआ है। सहारनपुर एक प्रसिद्ध व्यवसायी नगर है। देश के प्रमुख स्थानों से रेल, मोटर और अन्य यात्रा के साधनों से इसका सीधा सम्पर्क है। इसी नगर से शाकम्भरी क्षेत्र के लिये वर्ष भर के अतिरिक्त – सभी समय बस सेवा उपलब्ध है। 26 मील तक की यात्रा के लिये “सहारनपुर-चकराता” रोड से शाकम्भरी तक पक्की सड़क है। इसके अतिरिक्त बेहट से चकराता मार्ग पर चलकर बादशाही बाग पहुँचा जा सकता है। जहाँ से वन-विभाग की सड़क द्वारा शाकम्भरी पहुँचा जा सकता है। हरिद्वार से भी नियमित

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जय माता शाकम्भरी

एक यात्री बस आकर माँ के दर्शन कर चला आता है। माँ शाकम्भरी की दर्शन हेतु वैसे तो यात्री वर्ष भर आते ही रहते हैं पर दर्शन हेतु आश्विन शुक्ला चतुर्दशी के विशाल मेले में यात्रियों की संख्या डेढ़-दो लाख तक पहुँच जाती है। सारे का सारा विशाल शाकम्भरी क्षेत्र मेले का रूप धारण कर माँ की जय-जयकारों से गूँज उठता है। 4-5 दिन तक लम्बी-लम्बी दर्शनार्थियों की पंक्ति माँ के दर्शन की प्रतीक्षा करती है। श्रद्धालु इच्छा में खड़ी रहकर अपनी बारी की प्रतीक्षा करते हैं। श्रद्धालु जनता द्वारा सोने-चाँदी के छोटे-बड़े छत्र, चोले, हलवा-पूरी माँ को अर्पण किये जाते हैं। फाल्गुन पूर्णिमा (होली) और चैत्र शुक्ला चतुर्दशी को भी हजारों व्यक्ति माँ के क्षेत्र में पहुँचकर इसे मेले का रूप दे देते हैं। पुराणों और श्रुतियों के आधार पर यह मंदिर बहुत प्राचीन है। कई प्रसिद्ध इतिहासकार चन्द्रगुप्त मौर्य के शासन काल में इसकी विद्यमानता को स्वीकार करते हुए लिखते हैं कि बृहद्वट्ट (बेहट) उस समय एक बड़ा व्यापारी केन्द्र था। अपने प्रवास काल में चन्द्रगुप्त मौर्य यहाँ रहा और यहीं से वह मंदिर शाकम्भरी की दर्शन हेतु जाता था। मंदिर श्री शाकम्भरी देवी से लगभग पाँच मील दक्षिण की ओर एक छोटी सी राजपूती रियासत “जसमौर स्टेट” है। यहाँ के नरेश पोंडीर राजपूत, सूर्यवंशी और पौलास्त्य गोत्री हैं। इनकी रवांदगी शाख कलिंग देश (उड़ीसा) के राजवंश से है। यह शाख श्री राजा साहब बहादुर श्री जड़ासर सिंहजी के नेतृत्व में उत्तर की ओर विजय श्री प्राप्त की इच्छा से रवाना हुई। जो सम्वत 721 विक्रमी में मध्य गंगा-यमुना पर कायम हुई। जो सम्वत 1515 विक्रमी में चन्द्र साहब प्रताप सिंह बहादुर ने जसमौर आबाद किया । जसमौर स्टेट (जिला सहारनपुर) में एक सौ बारह देहात (गाँव) थे और श्री शाकम्भरी देवी व सहस्रा व कालूबाला इत्यादि

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जय माता शाकम्भरी

खुले व जंगल इत्यादि थे। जिन सबके एकमात्र अधिकारी जसमौर नरेश होते थे। सम्वत 721 से सम्वत 2021 विक्रमी तक लगभग 1200 वर्ष के समय में इस कलिंग राजवंशी शाखा में जो उत्तर की ओर विजय श्री लेती हुई रवाना हुई थी राजा साहब श्री जड़ासर सिंहजी से लेकर श्री राना साहब कुलवीर सिंहजी तक 28 रईस इस गद्दी पर हो चुके हैं। इनमें श्री राना साहब पूरणमल व श्री राना साहब अजयसिंह व श्री राना साहब अमरसिंह जो बड़े साहब अकबराबाद और नामी हो चुके हैं। उनतीसवीं श्री राना साहब कुलवीरसिंह जी का शुभ पाणिग्रहण आठ मई 1966 ई० को हुआ। श्रीमती रानी साहिबा बलसन स्टेट (शिमला) की राजकुमारी हैं। जसमौर स्टेट के राना वंश में अभी तक पीढ़ी दर पीढ़ी केवल एक पुत्र का ही जन्म होता रहा है। परन्तु इस उनतीसवीं पीढ़ी में माँ शाकम्भरी की पावन अनुकम्पा से सम्भवतः सर्वथा समयानुकूल जैसी इस युग की मांग है: श्रीमान राना साहब इन्द्रसिंह जी के पौत्र श्री राना साहब कुलवीर सिंह जी के पुत्र ठाकुर आदित्य प्रताप सिंह जी का तीसवीं पीढ़ी के रूप में, शुभ मुहूर्त में, जसमौर में बीस कुंवर साहब का जन्म हरिद्वार में और छोटे कुंवर साहब का जन्म देहरादून में हुआ। इस प्रकार राना साहब श्री कुलवीर सिंह जी के तीन पुत्र हैं। कन्या कोई नहीं है। इस समय भी इस भगवती शाकम्भरी के मंदिर व मंदिर के पास की जंगलात की सीमा तक की जमीन व बीरखेत के मैदान के वर्तमान जसमौर नरेश श्री राना साहब श्री कुलवीरसिंह जी अधिकारी हैं। राजपूत-राजा हमेशा से शक्ति के पुजारी रहे हैं। जो युद्ध के लिये प्रस्थान करते समय, और विजय-श्री करने के बाद इस

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ईश्वरीय शक्ति (माँ जगदम्बा) की पूजा करते थे। इससे इनकी प्रेरणा होती थी। तिस करके जसमौर-नरेश की पीढ़ी दर पीढ़ी से प्राप्त होती थी माँ का अनन्य भक्त रहा है। माँ शाकम्भरी उनकी कुलदेवी है और हमेशा से उनकी पूजा माँ शाकम्भरी के दाहिने छोटी सी मूर्ति बालगणपति की है। उसके दाहिने ओर भीमा और भ्रामरी और बायीं तरफ शताशी जी विराजमान हैं। मंदिर के बाहर आँगन में तरफ शिव, हनुमान, काली और भैरव जी की मूर्तियाँ हैं। इधर कुछ वर्षों से श्री राना साहब की आज्ञा व सहयोग से तथा कुछ दानशील व्यक्तियों के द्वारा प्रमुख द्वार से गर्भ गृह तक बड़ा सुन्दर भवन बन गया है। भवन का द्वार देखते ही भक्त भावविभोर जाते हैं। 20 जुलाई सन् 1980 को माँ की कृपा से मंदिर का विद्युतीकरण हो गया है। मंदिर के सामने ही स्वच्छ जल की प्राकृतिक जल धारा बहती है। इसके दूसरी ओर वीर क्षेत्र का विशाल मैदान है। कहा जाता है कि यह वही मैदान है जहाँ भगवती शाकम्भरी ने महिषासुर महादैत्य का वध किया था। इस वीर क्षेत्र में उत्तर की ओर मन्दिरनुमा, जो चारों ओर बंद एक स्मारक बना हुआ है। जहाँ भूतपूर्व जसमौर नरेश श्रीमान राना साहब जीवन साथी श्रीमती फूलदेई अपने पति के साथ सती हुई थी। यही जसमौर के रानाओं की प्रथम सती हुई थी। जसमौर के प्रत्येक व्यक्ति का व्यक्तिगत श्मशान घाट है। राना प्रत्येक का व्यथित क्रमशः घाट है। उसका अन्तिम संस्कार का यही आग्रह अन्तिम इच्छा रहती है कि जसमौर के राना संस्कार, श्री माँ शाकम्भरी के पवित्र चरणों में हो। यही होता रहा है।

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जय माता शाकम्भरी

विक्रमी सम्वत 2034, इक्कीस अप्रैल सन् 1977 ई० का मनहूस-दिन जबकि जसमौर स्टेट के भूतपूर्व जसमौर नरेश श्रीमान राना साहब जसमौर श्री राना इन्दु सिंह जी का निधन हुआ और वे सदा स्वर्गवासी हुए। जसमौर के राना परिवार पर पहाड़ टूट पड़ा। जसमौर एवं इलाके की प्रजा ने भी इसका अति दुःख माना। सबने कहा कि ऐसा देवता शासक होना मुश्किल है। बाईस अप्रैल को ही परम पूज्य स्वर्गीय राना साहब को प्रथम माँ शाकम्भरी के दर्शन कराये गये तदुपरान्त श्रीमती रानी साहिबा फूलदेवी के स्मारक के पास जसमौर वंश के परम्परागत श्मशान घाट में दाह संस्कार किया गया। स्वर्गीय श्रीमान राना साहब के दाह संस्कार स्थल पर उनकी समाधि का कार्यारम्भ हो चुका है एवं समाधि निर्माणाधीन है। चार मई 1977 ई० को स्वर्गवासी श्रीमान राना साहब की तेरहवीं हुई। जसमौर के आस-पास के गाँवों की हजारों की संख्या में जनता ने भोग व पितृ भोज में भाग लिया। ठाकुर श्री कुलवीरसिंह जी, ठाकुर साहब से राना जसमौर घोषित किये गये। भवन के बाड़ी और बिल्कुल सटे हुये अनेक धर्मार्थ पक्के मकानों का निर्माण, जनता की सुविधा के लिये, श्री राना साहब जसमौर की आज्ञा व सहयोग से, शुभ दानियों द्वारा हुआ है। पास ही में पहाड़ पर छिन्नमस्ता देवी का मन्दिर है। मन्दिर में एक मील पर पहले भूरादेव का एक छोटा सा मन्दिर है। इसे भगवती का पहरेदार कहा जाता है। कहते हैं, बिना पहरेदार को भेंट चढ़ाये माता भी भेंट स्वीकार नहीं करती। देवी का महात्म्य श्री देवी भागवत में इस प्रकार से है कि श्री देवी ने दुर्गम दैत्य तथा महिषासुर का वध यहीं किया। जिससे कि

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जय माता शाकम्भरी

उस स्थान का नाम बीरखेत है। जहाँ बलवान दैत्यों का संहार किया उस स्थान का नाम बीरखेत है। फिर करुणामयी अम्बा ने सौ वर्ष तक अनुग्रहित रही। फिर सौ वर्ष तक अनुग्रह से उत्पन्न कर लिये थे, 9 दिन व 9 रात द्वारा जो उन्होंने अपने शरीर से नदियाँ बहने लगी और पृथ्वी पर होरी तक अश्रुधारा बहाई जिससे दया हुई। तब देवी का नाम शताशी तथा कन्दमूल, सरल पैदा हुए। तब कन्द पाया जाता है तथा पहाड़ियों में भी सरल नाम का कन्द। श्री शाकम्भरी का मुख्य प्रसाद माना जाता है। श्री शाकम्भरी जी ने साग व मूल का भोग लगाया और ऋषि, मुनियों को भी दिया जिससे इनका नाम शाकम्भरी देवी पड़ा। देवी भागवत ९ स्कन्ध से मार्कण्डेय पुराण में भी वर्णन है- शाकम्भरीति विश्वरूपा तदा चास्याश्रयभूवि। तत्रैव च वधिष्यामि दुरितक्षयमाहसुरम् ॥१४९॥ जिसका उल्लेख दुर्गा सप्तशती में किया गया है- शाकम्भरी शताशी च सैव दुर्गा प्रकीर्तिता। यह देवी अयोनिज प्राकट हुई। यहाँ -शताशी। 2-शाकम्भरी 3-गणेश 4-भीमा 5- भ्रामरी मूर्तियाँ प्रतिष्ठापित हो गई हैं। ये सभी देवी के ही रूप हैं।

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जय माता शाकम्भरी

पद्मपुराण में भी इस प्रकार का उल्लेख है। रुद्र ने प्रश्न किया ब्रह्मा जी से कि प्रभो! आप कहाँ निवास करते हैं ? ब्रह्मा जी से बोले, पुष्कर में ब्रह्मा नाम से, गया में चतुर्मुख नाम से, कावेरी के तट पर सृष्टिकर्ता के नाम से, अन्य 100 तीर्थ बतलाये से शाकम्भरी में रसप्रिय नाम से। ऐसे इन्द्राक्षी स्रोत में भी वर्णन है कि- इन्द्राक्षी नाम सा देवी दैवतैः समुदाहृता। गौरी शाकम्भरी देवी दुर्गानाम्नीति विश्रुता।। त्रिशूला तीर्थ (तीनों युगों से आगे 1. सतयुग, 2. त्रेता, 3. द्वापर के बाद) कलयुग में। महाभारत वनपर्व तीर्थखण्ड में 4,3,7 मुनिराज पुलस्त्य भीष्मपितामह को बतलाते हैं। विशाला तीर्थ में आगे देवी का स्थान है। जिसका नाम शाकम्भरी है। यह तीनों लोकों में विख्यात है। जिस देवी ने दिव्य वर्ष तक शाक आहार किया और ऋषि मुनियों को भी शाक का भोग दिया। ततस्तु शाकम्भरी रीतयैव त्येव नाम तस्याश्च प्रतिष्ठितम्। शाकम्भरी समाख्याता ब्रह्मचारिणी समाहिता ॥११६॥ देवी भक्तों को तीर्थों में आने का फल अकथनीय है। भक्त स्वयं अपने पूर्वजों को पवित्र करता है। अविमुक्त विभवेन पराभव कारिणी, विश्वमोहिनी स्वशा बिहारिणी। सेवत तोहि सुलभ फल चारु, बरदायिनी त्रिपुरारि प्रियरी ॥११॥ देवी पूजन कमल चरण तुम्हारे, सुर नर मुनि सब होहि सुखारे॥१२॥ शरणागत दीनार्ति परित्राण परायणे, सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥१३॥ दुर्गा-पूजन १४११ प्रथम स्मृति वाचन। 2. गणपति पूजन। 3. कलस स्थापना। 4. नवग्रह पूजन। 5. षोडशमातृ पूजन। 6. चतुर्षष्टि योगिनी पूजन। 7. भैरवादि आवाहन।

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शाकम्भरी माता की कृपा सदा बनी रहे

यह पवित्र कथा शाकम्भरी माता के महिमा और चमत्कार को दर्शाती है।
माता की भक्ति और दर्शन से जीवन में सुख, शान्ति और समृद्धि आती है।

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